सोमवार, अक्तूबर 02, 2017

स्मृति साहित्य का व्याकरण है - लवली गोस्वामी

आज दिनांक 2 अक्टूबर २०१७ के दैनिक जागरण में युवा कवि लवली गोस्वामी के रचनाकर्म  पर वरिष्ठ कथाकार, पत्रकार गीताश्री जी की एक टिप्पणी प्रकाशित हुयी है. इस टिप्पणी को लिखने के क्रम में गीताश्री और लवली गोस्वामी के मध्य कुछ वार्तालाप मेल पर हुआ था. लवली ने यह मुझे पढ़ने को दिया. मुझे यह रोचक लगा. यह साक्षात्कार गीता जी और लवली की अनुमति से मैं यहाँ ब्लॉग पर लगा रहा हूँ. आप पढ़े इसमें कवि के रचनाकर्म और कविता पर कुछ रोचक टिप्पणियाँ हैं.

1. गीताश्री -    आपकी कविताएँ बहुत लंबी और शिल्प के स्तर पर भी थोड़ी दुरुह , एक्सपेरिमेंटल हैं. क्या जानबूझकर कर या होता चला गया.

लवली गोस्वामी -  पहले मैं लम्बी कविता के बारे में बात करती हूँ. कविताएं बहुत लम्बी हैं, ऐसा सिर्फ तब ही कहा जा सकता है जब आप आधुनिक हिंदी कविता के इतिहास को अनदेखा करेंगी. मैं छायावाद को छोड़ भी दूं तो नयी कविता में ऐसे अनेक उदाहरण आपके पास हैं, जो आपको मेरी कविताओं से अधिक लम्बी लग सकती हैं. शमशेर की टूटी हुई बिखरी, मुक्तबोध की “अँधेरे में” अज्ञेय की  “चक्रांत शीला, “असाध्य वीणा” आदि. मेरी अब तक लगभग चालीस के लगभग कविताएँ प्रकाशित होंगी जिसमे पाँच या छह वाकई लम्बी कविता कही जा सकती है. मैंने कई कविताएँ लिखी हैं जो पांच या सात लाइन की भी हैं. सबसे छोटी कविता चार लाइन की है. हर कवि में यह मिले – जुले रूप में होता है, कुछ कविताएँ लम्बी  कुछ छोटी होती हैं. जितने में लग जाए कि कोई बात यहाँ तक पूरी हो रही है, मैं उतना ही लिखती हूँ. मेरा ध्यान इस तथ्य पर रहता है कि बात संप्रेषित हुयी कि नहीं कविता कितनी लम्बी है या छोटी इसपर नहीं.

दूसरी बात शिल्प में कुछ प्रयोग मैंने किये हैं, ज़ाहिर है वे सचेतन प्रयोग है. मुझे महसूस हो रहा था कि अब तक की कविता में जो शिल्प मेरे पहले के मेरे बेहद प्रिय कवियों ने प्रयोग किया है वह मेरी बात के लिए अपर्याप्त है, तो जैसे मुझे बात स्पष्ट होती हुयी लगी मैंने उसे वैसे ही रखा. कुछ कविताओं “जैसे प्रेम के फुटकर नोट्स” और “आलाप” के प्रत्येक नए से लगते हिस्से के पहले एक दो या तीन लाइन का पूर्वकथन या फिर अंत में निष्कर्ष के रूप में कही गयी पंक्तियाँ इसी नए शिल्प का हिस्सा है. यह मेरी कोशिश थी मेरा अपना लहजा ढूँढने की, या साहित्यिक भाषा में कहें तो या मेरी काव्य – योजना थी मेरी सचेतन पोयटिक्स का हिस्सा.

तीसरी बात दुरुहता, मैं समझ नहीं पायी कि आपका इशारा है किस तरफ है, दुरूह भाषा या फिर वाक्यों का काव्यात्मक अर्थ या कविता के शिल्प की दुरुहता यह तीनों अलग बातें हैं. मैंने भाषा वही इस्तेमाल की है जो मैं किसी हिंदी भाषी से बोलते वक्त इस्तेमाल करती हूँ, हालाँकि मैं यह मानती हूँ कि लोगों से बात करते वक्त मैं जटिल हिंदी के शब्दों की जगह उनके अंग्रेजी अनुवाद भी उपयोग कर लेती हूँ, कविता में भी यह कभी – कभी होता है, कभी नहीं. कभी हिंदी के जटिल शब्द वैसे ही रह जाते है. और अर्थ में जो जटिलता दिखती है वह एक तरह से सामने वाले की दिमागी परिपक्वता और उसकी सहृदयता पर भी निर्भर है. कविता पढना सीखना पड़ता है. रस्ते चलते अख़बार पढ़े जा सकते हैं साहित्य नहीं. यह एक प्रकार से पाठक के लिए आग्रह और कसौटी दोनों है, कि आप रुक कर पढ़े अन्यथा न पढ़े. हालाँकि मैं पल्प लिटरेचर या सरल साहित्य कि आलोचक या विरोधी नहीं हूँ.
2.   गीताश्री -     प्रेम कविताओं में कुछ अनूठे बिंब, टटका -सा, तरल - सा कुछ. प्रेम आपकी कविताओं का मूल स्वर है. आप ख़ुद को किसका कवि मानती हैं? प्रेम या इतर ?

लवली गोस्वामी
लवली गोस्वामी - यह मैंने बहुत लोगों से कई बार सुना है कि “आपकी कविता का मूल स्वर “प्रेम” है”. मैं इससे इंकार नहीं करुँगी. स्त्री पुरुष के संबंध मुझे हमेशा से रोचक विषय लगे. मैंने स्त्री यौनिकता पर राजनितिक – आर्थिक दृष्टी से किताब भी लिखी है. हाल के दिनों में मैंने किसी पत्रिका के एक अंक के लिए एक आत्मकथ्य लिखा था इस विषय पर, (वह अभी प्रकाशित होने में समय है इसलिए मैं नाम नहीं लिख रही ), मैं वही बातें यहाँ दुहरा देती हूँ. मैंने लिखा था प्रेम, दर्शन और राजनीति तीनों ही मेरी कविताओं के प्रस्थान बिंदु हैं. मुझे लगता है प्रेम एक सूत्र है जिसमे आप जीवन के कई आयाम और उससे जुड़े अनुभव संजो सकते हैं.

पुराने ज़माने में जब कवि लिखते थे तो वे ईश्वर से या कला की देवियों (अलग – अलग सभ्यताओं में अपनी परम्परा के अनुसार ) से संवाद करते हुए अपनी कविता लिखते थे. बाद में ऐसा हुआ वे कविताएँ संवाद तो रही लेकिन उसमे कई और कई लोग जुड़ गए, जैसे सम्बन्धी, प्रेमी, गुरु, समाज या खुद कवि का अदर सेल्फ (अल्टर इगो), आदि. फिर भी विराट सत्ता जिसे आप आम भाषा में ईश्वर कह लें और प्रेमी को सम्बंधित कविताएँ अधिक रही. अगर कविता कवि की ध्वनि है तो किसी को संबोधित होगी. जो उसे प्रिय होगा, जो करीब होगा कवि उसे ही संबोधित करेगा, इस हिसाब से  प्रेम एक सूत्र है, जो जीवन भर में मिले कई अनुभव एक धागे में पिरोने में मदद करता है. लेकिन कविताओं में सिर्फ प्रेम नहीं होता  बल्कि समकालीन समाज, राजनीति और दर्शन से जुडी कई बातें होती हैं. मुख्यतः एक अनुभव जो स्वयं जीवन जितना बड़ा है, होता है.

3. गीताश्री  - आपके लिए कविताएँ क्यों जरुरी?  ऐसा लगता है जैसे भीतर से कुछ भरभरा कर निकल रहा हो. बहुत वाचाल हैं कहीं कहीं... ये क्या है ? मुक्ति का मार्ग है या अपने को खोने पाने का साधन ?

गीताश्री
लवली गोस्वामी - मैं नितांत सामाजिक प्राणी हूँ, जैसा कि हर मनुष्य होता है. मैं कई सांस्कृतिक – साहित्यिक संगठनों का अनौपचारिक हिस्सा भी रही हूँ. सांस्कृतिक साहित्यिक रूप से अपने परिवेश में हमेशा सक्रीय रही हूँ. अपने बचपन से मुझे लगता है बोलने के मुकाबले मैं लिख कर अपनी बात अधिक अच्छे से कह पाती हूँ. लिखना मुझे संतोष देता है. यह खुद को ढूंढना तो है ही, समाज में अपनी स्थिति को खोजना, अपनी जिज्ञासाओं और प्रश्नों के हल तलाश करना है. जो लोग मुझे पढ़ सकते हैं , उनसे यह पूछना भी है कि “जीवन को मैंने ऐसा देखा, आपका इस बारे में क्या ख्याल है ?” फिर उनके उत्तर पर सोचना है, फिर लिखना है यह एक निरंतर चलती प्रक्रिया है. जैसा कि मुक्तिबोध कह गए हैं – “मुक्ति है तो सबके साथ है.” भले ही मैं एकांत में साहित्य की साधना करूँ लेकिन वह एक दिन तो लोगों के सामने आएगा ही, इसी लिए लिखते हैं हम. हाँ, यह संवाद खुद से भी होता है, उतना ही, जितना दूसरे लोगों से.

यह साहित्य के हर फार्म में होता है मैं लगभग सात – आठ साल से लिख रही हूँ जिसमे मैंने एक किताब, कई निबंध और कई सारी कविताएँ लिखी है. अभी भी दो अधूरे प्रोजेक्ट में लगी हूँ, जो जाने कब पूरे होंगे. कविताये भी इस व्यापक दृश्य का हिस्सा है. यह विधा संक्षिप्त, सटीक और सुन्दर होने की ताक़त रखती हैं इसलिए विशेष प्रिय है. और कुछ है जो बहुत गहरे कहीं राहत देता है, जो अन्य फार्म कम या नहीं दे पाते, कविता  पीड़ा, क्लेश और अवसाद झेलने की ताकत देती है, फिर वह क्लेश व्यक्तिगत हो या सामाजिक. 

जहाँ तक वाचाल होने का प्रश्न है तो वाचाल कवि का “सेल्फ ” है या कविता मितभाषी नहीं है, यह दोनों अलग बातें हैं. अपनी तरफ से मैं दोनों पर नियत्रण रखने की कोशिश करती हूँ. यह याद रखने वाली बात है कि कवि का “मैं” सिर्फ उसका “मैं ” नहीं होता, उस बहाने से वह दुनिया के बहुत सारे “मैं” का प्रतिनिधित्व भी करता है. वह वाचाल है तो यह भी देखा जाना चाहिए कि कवि के पास शब्दों के अलावा कुछ और नहीं है. वह आपति ज़ाहिर करेगा, क्षमा मांगेगा, अफ़सोस करेगा, प्रतिरोध करेगा, सहमत होगा, प्रशंसा करेगा, राजनीति करेगा या प्रेम करेगा यह सब अभिव्यक्त शब्दों में ही होगा.

4. गीता श्री -     कविता कब आती है, कैसे ? लिख जाने के बाद क्या महसूस होता है ?
लवली गोस्वामी - अलग – अलग तरीके से आती है कविता, कभी किसी से बात करते, कोई वाक्य अचानक जुबान पर आ जाये और लगे कि कविता है, कभी अकेले बैठकर सोचते, कभी घर या बाहर के बहुत मामूली काम करते, बर्तन धोते या बाज़ार से सौदा खरीदते. कभी किसी मीटिंग के बीच. उसी क्षण नोट कर लेती हूँ. फिर उसे कहाँ रखना है या वह किस कविता का हिस्सा है यह बाद में तय करती हूँ. जब नहीं कर पाती तो बाद में याद करने की कोशिश करती हूँ. कई बार याद नहीं भी आती. तब अफ़सोस होता है.

कई बार कविताएँ पूरा होने में बहुत वक्त लेती हैं. “प्रेम पर फुटकर नोट्स” डेढ़ साल में लिखी गयी कविता है. ऐसा नहीं है कि मैं लगातार उसी पर सोच रही थी, बीच में कई लेख, एक किताब आदि लिखे लेकिन  वह खंड – खंड में दिमाग में आती थी. मैंने उसके मुकम्मल स्वरुप में आने का इंतजार किया. पूरा करके ख़ुशी हुयी. अक्सर होती है जैसे कोई भी अच्छा काम करके, अच्छा इटालियन खाना बनाकर, या फिर पेंटिंग करके होता है, किसी की मदद करके भी. मतलब एक तरह की तृप्ति, रचनात्मक तृप्ति.

 5.  गीताश्री -     आप ख़ुद को कविता में कहाँ देखती हैं और कहाँ पाती हैं?
-         लवली गोस्वामी    - यह मुश्किल सवाल है, मूलत मैं एक विद्यार्थी हूँ कविता की. अच्छी और सच्ची कविता की परम्परा में एक तुच्छ अभ्यासी. मैं कविता की पम्परा का बहुत सम्मान करती हूँ. अगर उसमे कुछ सकारात्मक जोड़ पाउंगी तो मुझे अच्छा लगेगा.

6. गीताश्री -  स्मृतियाँ बहुत हावी हैं आपकी कविताओं पर. क्या कविता के लिए स्मृति एक पवित्र और अखंड अवधारणा है जिसके पास बार बार लौट कर जाना पड़ता है
लवली गोस्वामी -    हर किस्म का सहित्य स्मृति पर आधारित होता है. अगर इसी क्षण मैं आपके मन से सब स्मृतियाँ पोछ दूं तो आप कुछ नहीं लिख पाएंगी. यह कोई पवित्र चीज नहीं, एक तरह से साहित्य की आत्मा ही स्मृति है. आप शब्द लिख रही हैं तो उसके पीछे परिभाषा एक स्मृति की तरह है. आप वाक्य बना रही हैं तो उसके गठन के आधार में व्याकरण की स्मृति है. स्मृति साहित्य का व्याकरण है. वह वास्तविक आधार है वह जिस पर आप साहित्य के झालरदार के कंगूरे गढ़ते है.

दैनिक जागरण से साभार.

शनिवार, जुलाई 22, 2017

हर कवि अपने पूर्वज कवियों का ऋणी होता है

सुप्रसिद्ध कवि कुँवर नारायण से लवली गोस्वामी की मुलाकात



कवि कुँवर नारायण के साथ लवली गोस्वामी 
 19 सितम्बर 1927 को जन्मे हिंदी के सुप्रसिद्ध कवि कुँवर नारायण नई कविता आन्दोलन के अग्रणी कवियों में से रहे हैं . कविता के अलावा कहानी ,लेख ,समीक्षाएँ साथ ही सिनेमा व् रंगमंच पर भी उन्होंने काफी लिखा है .उन्होंने कवासी और बोर्खेस की कविताओं के अनुवाद भी किये हैं .
कुँवर नारायण जी इन दिनों काफी बीमार हैं उन्हें ब्रेन हैमरेज हुआ है और वे कोमा में हैं . लगभग दो माह पहले  हमारी मित्र और हिंदी की युवा कवि लवली गोस्वामी उनसे मिलने उनके निवास पर गईं थीं . प्रस्तुत है उनकी कलम से इस मुलाकात का विवरण, जो संस्मरण भी है ,साक्षात्कार भी और अपने प्रिय कवि से मुलाकात के बहाने अपने साहित्यिक पुरखों के ऋण से उऋण होने का एक प्रयास भी - शरद कोकास

“ मैं  दिग्भ्रमित नहीं, एक जानकार की उदासीनता हूँ.” (कुँवर नारायण)


मैं उनके घर के सामने से गुजरने वाली गली में खड़ी थी. मुझे घर नंबर तो सही दिख रहा थालेकिन मैंने “बेल” गलत वाली दबाई। वहां मौजूद दो स्विचों में से मुझे निचली मंजिल की घंटी वाली स्विच दबानी थी। अक्सर ऐसा होता है, पता नहीं किन विचारों में घिरी रहती हूँ कि उजबक और हास्यास्पद गलतियां दोहराती रहती हूँ। जैसे जिस दरवाजे पर साफ़ "पुश " लिखा हो उसे अपनी तरफ खींचकर खुद को और लोगों को परेशां करना फिर माफ़ी मांगना और खुद को कोसना।

उपरी मंजिल से एक महिला की आकृति मुझे सवालिया निगाहों से देखती पूछती है – “..यस ?
"जी, मुझे कुँवर नारायण जी से मिलना है" मैं जवाब देती हूँ.
“ग्राउंड फ्लोर ”वह नीचे की तरफ इशारा करती है. शायद तब तक उनके पुत्र अपूर्व नारायण जी जिन्हे मैंने फोन करके अपने आने की सूचना दी थी और कुंवर जी से मिलने का वक़्त लिया था, मेरी आवाज सुन लेते हैं। बीसेक साल का एक युवक कुछ क्षणों में मेरे सामने प्रकट होता है और विनम्रता पूर्वक कहता है - "आइए... ". मैं उसके पीछे चलती हूँ। वह एक दरवाजा पार करके मुझे एक छोटे  कमरे तक ले जाता है. वहां मुझे अपूर्व खड़े  मिलते हैं. मैं उन्हें नमस्ते कहती हूँ। खिड़की के पास कोने में पड़े एक सोफे एक सौम्य महिला आकृति विराजमान है. ये भारती जी होंगी ऐसा मैंने अंदाजा लगाया। उन्हें नमस्ते कहा.

थोड़ी देर बाद कुँवर जी को सहारा देकर बैठकी में लाया जाता है मुझे बताया गया था वे एक कान से सुनने में पूरी तरह असमर्थ है और अभी– अभी डाक्टर से चेकअप करा कर लौटे हैं दो दिनों से वे एक कान से सुनने में असमर्थ हैं , देख तो वे बहुत दिनों से नहीं पाते उन्हें मेरे आने के बारे में पहले से मालूम है वे मेरी हथेलियाँ थामने के लिए दोनों हाथ आगे करते हैं, मेरा नाम लेकर बुलाते है, मैं उनकी कुर्सी के पास बैठती हूँ, भारती जी मुझे एक छोटा स्टूल देती हैं मैं अन्दर – अन्दर भींग रही थी, करुणा, आदर और प्रेम से, या इन सब के मिले –जुले से किसी अन्य भाव से

वे मेरा नाम भर जानते हैं थोडा रुककर परिचय पूछते हैं,मैं कुछ बताती हूँ अपने बारे में वे सुन नहीं पा रहे थे या, शायद मैं बोल नहीं पा रही थी उनसे बातें करने के लिए मुझे बार – बार भारती जी की मदद लेनी पड़ती है मुझे स्वीडिश कवि टॉमस ट्रांस्त्रोमर से जुडी एक घटना याद आती है जीवन के अंतिम सालों में उन्हें पक्षाघात की समस्या हो गई थी जिससे उनके शरीर के दाहिने भाग ने काम करना बंद कर दिया था उस वक़्त टॉमस ठीक से बोल नहीं पाते थे किसी से संवाद करने के लिए उन्हें पत्नी मोनिका की सहायता लेनी पड़ती थीजीवन के कई साल मोनिका ही उनकी आवाज बनी रहीं वे संगीत के बहुत अच्छे जानकार थे उन्होंने ऐसी धुनें बनायीं जिन्हें एक हाथ से बजाया जा सके। वे अक्सर अपने भाव संप्रेषित करने के लिए संगीत का सहारा लेते थे आयरिस नोबल विजेता कवि सेमस हेनी ने एक बार टॉमस पर टिप्पणी करते हुए कहा थाजब वे बोल पाने में असमर्थ थे, उन्होंने अपनी बात मुझ और मोनिका तक प्रेषित करने के लिए कई बार संगीत का सहारा लिया। सच ही लगता है, जब आपका भावबोध इतना परिष्कृत हो की शब्दों की ज़रूरत न पड़े तो यह बात बहुत अजीब नही लगती। लेकिन मुझे संगीत बुनना नहीं आता है, और बोलना या कम से कम अपनी भावना संप्रेषित करना मेरे लिए इसलिए भी ज़रूरी है कि कुंवर जी मुझसे पहली बार मिल रहे हैं. मैं जानती हूँ कि संगीत न सही दुनिया की सबसे आदिम भाषा अब भी उतनी ही सटीक है, स्पर्श की भाषा मैं उनकी उंगलियों के पोर और नाख़ून हलके – हलके से स्पर्श करती हूँ उनके पास बैठी कुछ बोलने की, अपने कुछ शब्द उन तक पहुँचाने की कोशिश करती हूँ, जिसमे भारती जी मेरी हर संभव मदद करती हैं भारती जी को इन कोशिशों में मुब्तिला देखते - सुनते मेरे मन में कुँवर जी की पंक्तियाँ कौंधती हैं.

“ स्त्री - पुरुष के संबंधों का अर्थ
साधना में विघ्न डालती अप्सरायें ही नहीं
एक ऋषि की सौम्य गृहस्थी भी हो सकती है.”

ऐसा ही मुझे ट्रांस्त्रोमर के साथ उनकी पत्नी मोनिका को वीडियो में देखकर लगा था.

सादगी अभाव नहीं
एक संस्कृति की परिभाषा है... “


एक बार मैंने लिखा था – “ भव्यता निस्तब्धता से भर देती है.  भव्यता संक्रमित भी करती है.ऊँचे पहाड़ उंचाई के अकेलेपन से आक्रांत करके आपको स्थिर कर देते हैं. श्मशान अपनी नीरवता, अपनी मनहूसियत का कुछ हिस्सा आपको निराशा के रूप में सौंप देता है.चंचल नदियाँ आपके अंतर में तरल कुछ छेड़ जाती हैं. भव्य ईमारतें आप में संभ्रात और पुरातन स्मृतियाँ जीवित कर देती हैं असीम   समुद्र आपको गहरे चिंतन में धकेल देता है और आकाश का विस्तार आप में शून्य भर देता है. यह सब भव्यताएँ हैं , संक्रमित करने वाली भव्यताएं.आप में खुद को भरने वाली भव्यताएं. ” 

इस वक्त जिस इन्सान के सामने मैं बैठी हूँ वह भी मेरे लिए ऐसी ही एक सकारात्मक भव्यता है. मैं भव्यताओं के समक्ष अक्सर शब्दहीन हो जाती हूँ. मेरा “कम बोलना” “न बोलने” में बदल जाता है.
  
**
“तुम्हे मेरी कविता में क्या पसंद है ?”
वे मुझसे सवाल करते हैं, जब मैं उन्हें बताती हूँ कि मैंने आपको लगभग पूरा पढ़ा है लगभग इसलिए कि यह पंक्तियाँ लिखे जाने तक उनका संग्रह “चक्रव्यूह” और सिनेमा पर लिखी उनकी नयी किताब “लेखक का सिनेमा ” मेरे पास नहीं हैं मैंने सिर्फ यही दो किताबें नहीं पढ़ीं हैं मैंने कहा मुझे आपकी “सरलता” पसंद है वे सुन न सके भारती जी ने मेरा जवाब दोहराया फिर बातें होती रही. दर्शन, साहित्य, इतिहास और कला के समकालीन और ऐतिहासिक सन्दर्भ, व्यक्ति, स्थान और किताबें हमारे बीच आते – जाते रहे मैं उन्हें देखती उनकी कविता की स्मृतियों में डूब रही थी. मैं उनके हाथ देखती हूँ.

“अब मेरे हाथों को छोड़ दो
गहरे पानी में
वे डूबेंगे नहीं
उनमे समुद्र भर आएगा  ...”

मैं उस कवि से बात कर रही थी, जो कवि की मासूमियत से नहीं, एक द्रष्टा के दर्प से, दर्शन की वस्तुगतता से मनुष्यता की कोमलता की तरफ लौटता है. साथ ही साथ मैं उनकी कविता से भी बात कर रही थी। जब एक कवि की वाणी में द्रष्टा का दर्प मौजूद हो तो यह समझाना चाहिए कि इस दर्प की जड़ें जीवनानुभाव की अथाह गहराइयों में सुदूर कहीं गड़ी होंगी कविता, जलीय पौधे के फूल की तरह होती है जो सतह तक जीवित रहने के सामर्थ्य और जिद का कलात्मक सुन्दर रूप बनकर पहुँचती है. फूल को सतह तक पहुचने के लिए प्रकाश की अदम्य चाह होनी चाहिए इसके साथ ही उसकी रीढ़ में, गहराइयों में व्याप्त अँधेरे और जल के अथाह दबाव से लड़ने का सामर्थ्य भी होना चाहिए कविता वह जलीय फूल है, जो दुखों, प्रश्नों और विकलता के उन बीजों से पैदा होती है जो हमारे मन में, अनुभवों में, गहरे कहीं दफ्न होते जाते हैं. असमंजस और कई तरह के दूसरे मानसिक दबावों से जूझती कवि के अथाह अंधकार से निकलकर कविता  वैसे ही काग़ज तक पहुँचती है, जैसे कोई फूल पानी की सतह से उपर तक अधिकतर पढ़ने वाले सिर्फ उसका दृश्य रूप या “साकार” होना पढ़ पाते हैं, जो पीडाएं कविता की जननी होती है उसे कितने लोग समझ पाते हैं ?

“ किसी के सामने टूटने से बेहतर है
अपने अन्दर टूटना ..”

बीज का अस्तित्व भी नवांकुर पौधे  के दो-पहले पत्तों और जड़ोंका आकर लेने में “टूटता” ही है

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कुंवर नारायण, जो इंगित करते हैं कि “वहां विभाजित स्वार्थों के जाल बिछे दिखते/ जहाँ अर्थपूर्ण संधियों को होना चाहिए”, संतुलन के कवि है, सरलता के कवि है, दार्शनिकता के कवि है, तीनों वाक्यों को मिलाकर कहा जाए तो एक संतुलित दार्शनिक - सरलता के कवि है अपनी ही कविता में वे स्पष्ट कहते हैं “अति को जानो/ वहां ठहरो मत/ लौटो/ अपने अन्दर उसी संतुलन बिंदु पर/ जहाँ संभव है समन्वय..” ये समन्वय, ये संतुलन ही, बार –बार उनकी दर्पिली ध्वनि का मूलभाव बनकर उनके कवितार्थों को आलोकित करता है वे कठिन कटु सत्यों को कहते हुए भी अतिशय तिक्त नहीं होते. क्योंकि वे तीक्ष्णता को जानकर उसे अस्वीकार करके लौट चुके हैं.

“मैं उन चेष्टाओं की
शेष पूंजी हूँ
जिसे तुम नहीं समय प्राप्त करेगा “

कोई भी कविता सिर्फ कवि की अपनी चेतना की उपज नहीं होती कई प्रकार से वह पूर्वज कवियों का ऋणी होता है कोई साधारण मनुष्य भले ही कविता की भूमिका को अपने जीवन में नकार दे लेकिन कोई भी पढ़ा – लिखा मनुष्य इस बात से इंकार नहीं कर सकता कि जो  शब्द, वाक्य- रचना,कहावत, भावाभिव्यक्ति के औजार अथवा बिम्ब वह अपनी सामान्य बातचीत में इस्तेमाल कर रहा है वे कहीं न कहीं साहित्य की देन हैं इस तरह जो भी कविता नयी लिखी जाती है उसमे गुजर चुके या गुजर रहे कई कवियों की ध्वनि होती है. यह ध्वनि सिर्फ तब ही होगी जब आप कविता की परम्परा का अध्ययन करेंगे, ऐसा नहीं है जानते न जानते, चाहते न चाहते हम अपनी भाषा में कविता लेकर आते ही हैं, भले ही वह लोकप्रिय सिनेमा के असर से आये या सदियों से चली आ रही मिथकीय अथवा लोक – साहित्य की वाचिक परम्परा से. इस समय में लिखी जा रही हर कविता अपनी पूर्वज कविताओं की संतान है. अपने पितरों का आभार प्रकट करना उसका विनम्र कर्तव्य है. वैसे तो यह  पुनीत कर्तव्य समाज का भी है कि वह भाषा को बनाने के लिए साहित्यकारों का आभार प्रकट करे
 
जब कोई कवि भाषा में कविता रच रहा होता है, ठीक उसी समय कविता अपने रचे जाने के समानांतर उस भाषा को भी रच रही होती है, और तो और कविता “कवि” को भी रच रही होती है.

**
“ मैं अपनी अनास्था में अधिक सहिष्णु हूँ
अपनी नास्तिकता में अधिक धार्मिक
अपने अकेलेपन में अधिक मुक्त
अपनी उदासी में अधिक उदार “
(आत्मजयी)

कुँवर नारायण जी के तीनों प्रबंध काव्यों में “सरलता” एक अंतरिम लय की तरह बहती है, कुछ – कुछ विवाल्दी के संगीत की तरह जिसमे नरम ढलान से नीचे की ओर बहते पानी की धार की अटूट लय होती है. साथ ही साथ एक विनम्र वेग भी होता है इस सौम्य कलकल में उन बूंदों का तादात्म्य भी मौजूद है जो ढलान की समरूपता टूटने से उछलती शेष जलराशि से अलग होती सी लगाती है लेकिन वेग इतना प्रचंड नहीं होता कि कोई भी बूंद छिटक कर उतनी दूर जा गिरे कि खुद को अनाथ महसूसे विवाल्दी का संगीत भी मुझे ऐसा ही लगता है. सौम्य, लयात्मक, भव्य और एकसार कुँवर नारायण जी का व्यक्तिव भी ऐसा ही है लयात्मक और सौम्य लेकिन अपनी विनम्रता में भव्य
 
मैं उन्हें इस अवस्था में अधिक परेशां नहीं करना चाहती, इसलिए लौटती हूँ,इस निश्चय के साथ कि जो अब लौटी तो कृतज्ञतर लौटूंगी
-
लवली गोस्वामी

( लेख में जो कविता पंक्तियाँ उपयोग की गयी हैं. कुँवर नारायण की कविताओं से ली गयी हैं. )

गुरुवार, सितंबर 22, 2016

देह नहीं मनुष्य की यह वसुंधरा है


मुक्तिबोध सम्मान से सम्मानित ज्ञानरंजन 

पहल 104 में प्रकाशित

शरद कोकास 

की 

लंबी कविता

' देह 

से एक अंश



अजूबों का संसार है इस देहकोष के भीतर
अपनी आदिमाता पृथ्वी की तरह गर्भ में लिए कई रहस्य
आँख जिसे देखती है और बयान करती है जिव्हा
आँसुओं के अथाह समंदर लहराते हैं जिसमें
इसकी किलकारियों में झरने का शोर सुनाई देता है
माँसपेशियों मे उभरती हैं चटटानें और पिघलती हैं
हवाओं से दुलराते हैं हाथ त्वचा महसूस करती है
पाँवों से परिक्रमा करती यह अपनी दुनिया की 
और वे इसमें होते हुए भी इसका बोझ उठाते हैं

अंकुरों से उगते रोम केश घने जंगलों में बदलते
बीहड़ में होते रास्ते अनजान दुनिया में ले जाने वाले
नदियों सी उमडती यह अपनी तरुणाई में
पहाडों की तरह उग आते उरोज
स्वेदग्रंथियों से उपजती महक में होता समुद्र का खारापन
होंठों पर व्याप्त होती वर्षावनों की नमी
संवेदना एक नाव लेकर उतरती रक्त की नदियों में
और शिराओं के जाल में उलझती भी नहीं
असंख्य ज्वालामुखी धधकते इसके दिमाग़ में
हदय में निरंतर स्पंदन और पेट में आग लिए
प्रकृति के शाप और वरदान के द्वंद्व में
यह ऋतुओं के आलिंगन से मस्त होती जहाँ
वहीं प्रकोपों के तोड़ देने वाले आघात भी सहती है

सिर्फ देह नहीं मनुष्य की यह वसुंधरा है
और इसका बाहरी सौंदर्य दरअसल
इसके भीतर की वजह से है।

शरद कोकास

🔶🔶🔶🔶

*पूरी कविता पढ़ने के लिये इस लिंक पर क्लिक कीजिए* 👇🏽

http://pahalpatrika.com/frontcover/getdatabyid/245?front=30&categoryid=7


📗📙📘

गुरुवार, अगस्त 25, 2016

पहल 104 में प्रकाशित लम्बी कविता 'देह'


शरद कोकास की लम्बी कविता 'देह'



हिंदी साहित्य में 'पहल' एक महत्वपूर्ण साहित्यिक पत्रिका है.वरिष्ठ कथाकार ज्ञानरंजन जी जिसके संपादक हैं . सन 2005 में पहल ने मेरी लम्बी कविता 'पुरातत्ववेत्ता' जो लगभग 53 पेज की है पहल पुस्तिका के रूप में प्रकाशित की थी . पहल पुस्तिका के रूप में किसी भी रचनाकार की रचना छपना रचनाकार का सम्मान है . अभी ग्यारह वर्षों पश्चात पुनः 'पहल' पत्रिका ने मेरी लम्बी कविता 'देह' प्रकाशित की है . यह कविता 22 पेज की है . 'पहल' का यह अंक क्रमांक 104  धीरे धीरे लोगों तक पहुँच रहा  है और मुझ तक बधाईयाँ भी आ रही हैं . अभी पिछले दिनों जब मैं जबलपुर गया था तो वहां ज्ञानरंजन जी ने पहल का यह अंक मुझे दिया . प्रसिद्ध कवि मलय जी से भी मुलाक़ात हुई और उन्होंने भी कविता की बहुत प्रशंसा की .


आप सब के लिए इस कविता के एक अंश के साथ पहल पत्रिका में प्रकाशित लम्बी कविता 'देह का यह लिंक दे रहा हूँ . उम्मीद करता हूँ आप सभी को यह कविता अवश्य पसंद आयेगी .


शरद कोकास की लंबी कविता
' देह ' से एक अंश 

अजूबों का संसार है इस देहकोष के भीतर
अपनी आदिमाता पृथ्वी की तरह गर्भ में लिए कई रहस्य
आँख जिसे देखती है और बयान करती है जिव्हा
आँसुओं के अथाह समंदर लहराते हैं जिसमें
इसकी किलकारियों में झरने का शोर सुनाई देता है
माँसपेशियों मे उभरती हैं चटटानें और पिघलती हैं
हवाओं से दुलराते हैं हाथ त्वचा महसूस करती है
पाँवों से परिक्रमा करती यह अपनी दुनिया की
और वे इसमें होते हुए भी इसका बोझ उठाते हैं

अंकुरों से उगते रोम केश घने जंगलों में बदलते

बीहड़ में होते रास्ते अनजान दुनिया में ले जाने वाले
नदियों सी उमडती यह अपनी तरुणाई में
पहाडों की तरह उग आते उरोज
स्वेदग्रंथियों से उपजती महक में होता समुद्र का खारापन
होंठों पर व्याप्त होती वर्षावनों की नमी
संवेदना एक नाव लेकर उतरती रक्त की नदियों में
और शिराओं के जाल में उलझती भी नहीं
असंख्य ज्वालामुखी धधकते इसके दिमाग़ में
हदय में निरंतर स्पंदन और पेट में आग लिए
प्रकृति के शाप और वरदान के द्वंद्व में
यह ऋतुओं के आलिंगन से मस्त होती जहाँ
वहीं प्रकोपों के तोड़ देने वाले आघात भी सहती है

सिर्फ देह नहीं मनुष्य की यह वसुंधरा है

और इसका बाहरी सौंदर्य दरअसल
इसके भीतर की वजह से है ।

शरद कोकास

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